
नंदना के बड़े जंगल में नन्हा आरव अपनी नीली कमीज़ पहने, गेंदे के फूलों से सजी पगडंडी पर कूदता-फाँदता चला जा रहा था। आज नदी पर दीप-उत्सव था, और उसका छोटा-सा मन ख़ुशी से भरा हुआ था।

नंदना के बड़े जंगल में नन्हा आरव अपनी नीली कमीज़ पहने, गेंदे के फूलों से सजी पगडंडी पर कूदता-फाँदता चला जा रहा था। आज नदी पर दीप-उत्सव था, और उसका छोटा-सा मन ख़ुशी से भरा हुआ था।

वह धीरे-धीरे गुनगुना रहा था, और चारों ओर सुनहरे पत्ते चुपचाप गिर रहे थे। पवित्र बरगद की डालियों से मोरों की मीठी पुकार आ रही थी, और सब कुछ गरम, सुनहरा और प्यारा-सा लग रहा था।

तभी आरव की मुलाकात एक बूढ़ी, समझदार हथिनी गुरुजी से हुई, जिसका नाम गजमाता था। उसकी पीठ पर नन्हे-नन्हे मिट्टी के दीयों से भरी एक टोकरी सजी थी, और वह धीरे-धीरे नदी के घाट की ओर चली जा रही थी।

अचानक एक नन्हा दीया डगमगाया और टप्प से केसरिया धूल में, ठीक आरव के नन्हे पाँवों के पास आ गिरा। दीया वहीं चुपचाप पड़ा रहा, मानो आरव से कुछ कहना चाहता हो।

आरव के नन्हे मन में एक प्यारी-सी इच्छा जागी — अपनी इस बड़ी, कोमल साथी की मदद करने की। उसका छोटा-सा दिल गरम दीये की तरह झिलमिला उठा।

बहुत प्यार से उसने वह नन्हा दीया अपनी दोनों हथेलियों में उठा लिया, मानो कोई जुगनू पकड़ा हो। फिर वह गजमाता के साथ-साथ, धीरे-धीरे, उस नन्हे दीये को थामे चलने लगा।

जंगल की घनी छाँव के नीचे रास्ता अंधेरा होता गया, और आरव सोचने लगा — क्या उसका इतना नन्हा-सा दीया इस बड़े रास्ते को रोशन कर पाएगा? उसकी नन्ही उँगलियाँ दीये को थामे थोड़ी सहम-सी गईं।

तब गजमाता ने धीमी आवाज़ में एक मीठी पहेली कही — "प्यार से थामा गया सबसे छोटा दीया भी पूरे रास्ते को रोशन कर देता है, बेटा।" और सच में, उनके दोनों दीयों की रोशनी मिलकर पूरे जंगल को गरम, सुनहरे उजाले से भर रही थी।

आख़िरकार वे नदी के घाट पहुँचे, जहाँ नन्हे-नन्हे दीये पानी पर तैरते हुए छोटे-छोटे तारों जैसे लग रहे थे। गजमाता ने अपनी कोमल सूँड़ से आरव के घुंघराले बालों को प्यार से सहलाया, मानो धीरे से "धन्यवाद" कहा हो।

आरव गजमाता के गरम पहलू से टिककर बैठ गया, और उसकी आँखें धीरे-धीरे नींद से भारी होने लगीं। तभी बुद्धिमान हथिनी ने धीरे से कहा — "प्रेम से थामा गया सबसे छोटा दीया भी सारे संसार को रोशन कर देता है।" और ऐसा ही था।

Sweet dreams.